मोतिहारी:-पत्रकार भी श्रमजीवी होते है ।

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बिहार संवाददाता सिकंदर राय की रिपोर्ट

मोतिहारी । पूरे विश्व मे मजदूर दिवस मनाया गया । लॉक डाउन के इस त्रासदी भरे माहौल में मजदूर दिवस की औपचारिकता ही पूरी हुई।जितने भी श्रम से जुड़े हुए लोग हैं सभी मजदूरों की श्रेणी में ही आते हैं चाहे वह संगठित हो या असंगठित ,लेकिन अफसोस कि जिस तरह आज के समय डॉक्टर, पुलिस, सफाई कर्मी एवं मेडिकल से जुड़े हुए तमाम लोगो के साथ प्रशासन एवं सरकार है।लेकिन मीडिया कर्मी भी जान हथेली पर लेकर अपने पत्रकारिता धर्म का निर्वाह कर रहे हैं ।उनके पीठ पर कौन है?हर पल का खबर वे पहुंचा रहे हैं । जहां सभी कार्यालय बंद है उस दौर में भी मीडिया के लोग सडको पर दौड़ लगा रहे हैं। कोरोना वायरस से युद्ध करते हुए सभी मिडियाकर्मी चाहे वे अखबार के पत्रकार हो या सोशल मीडिया के या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के, जान जोखिम पर डालकर वे समाचार एवं फोटो कवरेज कर रहे हैं। पत्रकारों को कहीं से ना तो कोई सहूलियत है और ना ही कोई सुरक्षा । आज सिर्फ उनको घूमने के लिए परमिशन मिला हुआ है ।समाज और सरकार के लोग सभी पत्रकारों से उम्मीद बहुत रखते हैं। हर समाचार के प्रति उनके अंदर मे ललक रहती है कि मैं भी मीडिया में हमेशा आता रहूं। लेकिन हर स्तर पर पत्रकारों के प्रति संवेदनहीनता ही सभी में दिखती है।

कोरोना वायरस संक्रमण के काल में जहां लॉक डाउन से सारे उद्योग बंद हो चुके हैं, मीडिया उद्योग पर भी खतरा मंडराने लगा है। अभी मीडिया घराना अपने को बचाने का भरसक कोशिश कर रहा है, लेकिन जिस तरह से मीडिया घराना के ऊपर अपने पत्रकारों के शोषण का दाग लगा हुआ है ,पत्रकारों की मौत, पत्रकारों की तड़प , आत्महत्या आदि का उनके ऊपर दाग है, ऐसी स्थिति में शोषण एवं कुकर्मों का परिणाम तो उसे मिलाना तय है । अच्छे कर्मों का फल हमेशा अच्छा होता है और बुरे कर्मों का फल हमेशा बुरा ही होता है।मीडिया घराने को अब अपने बुरे वक्त के लिए तैयार रहना होगा, क्योंकि यह उद्योग भी अन्य उद्योगों की तरह चरमरा गया है। सोशल मीडिया ने इनका बंटाधार कर के रख दिया है । इसके पीछे का जो कारण है वह मीडिया घराना के लोगो को मालुम है।वे अपने को दोष से बचा नहीं सकते हैं।,।2011 के बाद किसी भी मीडिया कर्मी को हटाने का अधिकार उन्हे नहीं रहा ,वेतनमान भी उन्हें मजीठिया का ही देना था। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय बहुत पहले आया है।,फुल बेंच का निर्णय आया, अवमानाका भी निर्णय आया । सभी पत्रकारों के पक्ष में है। सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्णय दिया है उसे कानूनी पेच मे उलझाकर मीडिया घराना अपराध कर रहा है और मारे जा रहे हैं पत्रकार। जिले के जाने-माने साहित्यकार -पत्रकार एवं कवि सुरेन्द्र कुमार ने मजदूर दिवस पर कहा कि श्रमजीवी पत्रकार बंधुओं के साथ न्याय होना चाहिए। सही न्याय यही होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकारों के पक्ष में जो निर्णय दिया है उस निर्णय को केंद्र सरकार एक माह के अंदर लागू करवाये और तमाम पत्रकारों को मजीठिया वेतन मान दिलावे।हटाये गये पत्रकारो को सूद समेत जो भी राशि संबंधित घराने पर गिरता है ,उसका भुगतान अविलंब कर दे। इसके साथ तमाम कार्यरत पत्रकारों को उनकी नियुक्ति की तिथि का पत्र दे ।साथ साथ मजीठिया आयोग का वेतनमान दे।