“बेटी का पिता होना किसी अभिशाप से कम नहीं वो भी तब जब उसकी शादी हो गयी हो।” — पूजा सिंह समाज सेविका

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सभ्य समाज के विकास में दहेज एक कुष्ठ रोग के समान है ।

“बेटी का पिता होना किसी अभिशाप से कम नहीं वो भी तब जब उसकी शादी हो गयी हो।”
“दहेज” प्रथा कहें या कुप्रथा, ये आज भी हमारे समाज में उपस्थित है और आज भी आपको बहुत सारे दहेज लोभी लोग सामाज में मिलेंगे।
जिन्हें ज़रा भी भान नहीं की अपनी इस सोच के चलते वो समाज का कितना बड़ा नुक्सान कर रहे। कुछ तो ऐसे महानुभाव मिलेंगे जो दहेज के नाम पे वधु पक्ष से घर, गृहस्ती की वस्तुएं, कपड़े, समान सब लिये होंगे पर फिर भी उन्हें कैश ना मिलने का मलाल जीवन भर होता है।
इस कुप्रथा में सिर्फ दहेज लेने वाले ही गलत नहीं हैं बल्कि दहेज देने वाला भी उतना ही गलत है क्योंकि वो दहेज देकर सामने वाले की मांगने और पाने वाले की इच्छा को और प्रबल करता है । समाज के उन लोगों के लिये मुश्किलें खड़ा करता है जो दहेज देने में सक्षम नहीं होते।
सोचने वाली बात है की एक पुत्र के पिता की ये सोच होती है की मेरे बेटे को मैंने इतना पढ़ाया लिखाया उस पे इतना खर्च किया, वो इतना कमा रहा तो हमारी भी कुछ उम्मीदें हैं। और उस उम्मीद का नाम है “दहेज”…..
ऐसी सोच वाले माँ बाप के लिये उनका पुत्र किसी दुकान की तरह होता है। दहेज मिल गया तो दुकान चल गई और दहेज नहीं मिला तो दुकान पिट गयीं ।
अब ज़रा दूसरा पक्ष (लड़की के पक्ष) भी देखिये… एक बेटी का पिता भी उसे पढ़ाता- लिखाता है, उच्च शिक्षा दिलाता है, उसकी माँ उसे घर का भी काम सिखाती है और संस्कारों की भी शिक्षा देती है, पिता के लिये बेटियां उनका अभिमान होती हैं और एक बेटे से कम नहीं होतीं, इन सब के बाद उस बेटी की शादी कर उसे दूसरे को सौंपना होता है बिना जाने की भविष्य के गर्भ में क्या होगा। इसके साथ शादी में पचास तरह के खर्च और साथ में दहेज इत्यादि सब देकर विदा करता है एक पिता, उसके बाद भी उसका हर तीज, त्योहार पर्व पर उसकी ज़रूरतों का ख्याल रखता है, उसे क्या चाहिये तब भी एक पिता ही इसका ध्यान देता है, और अगर वो बीमार है उसे कोई तकलीफ है तो भी उस बेटी का साथ एक माँ बाप ही मरते समय तक देते हैं, यहां तक की उनका दामाद रुपी बेटा भी किसी परिस्थिति में हो तो वो ज़िम्मेदारी भी उनकी ही है। आखिर उन्होंने बेटी जो दी है । ससुराल वाले जीवन भर भजाते हैं अपने बहु के घरवालों को खुद चाहे कौड़ी मात्र भी हैसियत ना हो। जिन घरों में बेटियां नहीं होतीं उनकी स्थिति तो इसे भी बुरी होती है क्योंकि ऐसे लोगों को न बेटियों का दर्द समझ आता है ना ही बेटियों के माँ बाप का।
और हैरानी तो तब बढ़ जाती है जब जिनके आगे बेटियाँ वो भी ऐसे परिस्थितियों में आग में घी का काम करते हैं। जो पराई हो गयी, जिसे समाज पराया बना देता है वो अब भी ज़िम्मेदारी अपने माँ बाप की ही होती है। क्योंकि दहेज देकर वो पहले ही गलती कर चुके होते हैं… और ये तो जगजाहिर है की दहेज से किसी की बेटी ससुराल में खुश नहीं होती जब तक ससुराल वाले उसे अपनी बेटी ना मानें, बेटी छोड़िए बहु मान लें एक इंसान ही मान लें वो भी बहुत है।
समाज के ऐसे घृणित लोगों को शायद भगवान का भी डर नहीं, पर एक दिन जाएंगे तो उन्ही के पास, पर क्या मुह लेके… एक लोभी, लालची, स्वार्थी इंसान के रूप में, जिसने बच्चों के आगे पैसे को महत्व दिया और अपने बच्चे को ही समाज में हंसी का पात्र बना दिया। पर शायद वो भूल गये या भूल जाते हैं की परमेश्वर सब देख रहा।

तो आपकी राय में “दहेज” प्रथा का क्या कोई निवारण है। कैसे रोका जा सकता है इसे और दहेज लेने वाले या उसे पाने की सोच रखने वाले के लिये क्या सज़ा होनी चाहिये? क्या ऐसे लोगों पर दहेज का केस डालना चाहिये? क्या यही एक मात्र विकल्प है? 🙏🏻

समाज सेविका
पूजा सिंह

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