जागरूक रह कर हमें अपना खुद का ख्याल रखना होगा -पूज्य पाद गुरुपद सम्भव राम जी

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माँ महा मैत्रायणी योगिनी जी का निर्वाण दिवस श्रद्धापूर्वक मनाया गया।

वाराणसी। बुधवार, दिनांक 13 जनवरी 2021 को ग्राम डोमरी के अघोरेश्वर भगवान राम घाट, गंगातट स्थित परमपूज्य अघोरेश्वर महाविभूति स्थल के पुनीत प्रांगण में परमपूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी की जननी “माँ महा मैत्रायणी योगिनी जी” का 29 वाँ निर्वाण दिवस श्रद्धा एवं भक्तिमय वातावरण में मनाया गया। मनाने के क्रम में प्रातः 6 से 7 बजे तक स्वयं सेवकों द्वारा आश्रम परिसर की साफ-सफाई की गई। लगभग 8:30 बजे से पूज्यपाद बाबा गुरुपद संभव राम जी ने परमपूज्य अघोरेश्वर महाप्रभु एवं माताजी की समाधि पर माल्यार्पण, पूजन एवं आरती किया। इसके बाद श्री पृथ्वीपाल जी ने सफलयोनि का पाठ किया। तत्पश्चात् पूज्य बाबा जी ने हवन-पूजन किया। पूर्वाह्न 11:30 बजे से एक पारिवारिक विचार गोष्ठी आयोजित की गयी जिसमें वक्ताओं ने माँ महा मैत्रायणी योगिनी जी को याद करते हुए उनसे प्रेरणा लेने की बात कही। वक्ताओं में डॉ० वीणा जी, श्रीमती उषा जी, श्रीमती पूनम जी, श्रीमती प्रीतिमा जी थीं। भजन प्रस्तुत करने वालों में श्रीमती प्राची जी, श्रीमती गिरिजा जी, कुमारी प्रतिभा थीं। गोष्ठी का शुभारम्भ कुमारी गुंजन के मंगलाचरण से हुआ। गोष्ठी का सञ्चालन श्रीमती वीणा सिंह जी ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन श्रीमती सुष्मिता ने किया।
अपने-आपकी रक्षा स्वयं करें
-पूज्यपाद बाबा गुरुपद संभव राम जी
अपने आशीर्वचन में संस्था के अध्यक्ष पूज्यपाद बाबा अवधूत गुरुपद संभव राम जे ने कहा कि आज इस अवसर पर हमलोगों ने महा मैत्रायणी योगिनी जी को याद किया। हमलोग आश्रमों में संत-महापुरुषों के यहाँ आते-जाते हैं तो उनकी शिक्षाओं को आत्मसात करें। रास्ते में बहुत-सी ऐसी चीजें हैं जो हमको भटकाव की तरफ ले ही जाती हैं और हमलोग पहुँच नहीं पाते हैं। हम उन आश्रमों में, विहारों में उन महापुरुषों की बातों को सुनते हैं, लेकिन चिंतन-मनन नहीं करते हैं, उन पर चलने का प्रयत्न नहीं करते हैं, उसके अर्थ को समझने का प्रयत्न नहीं करते हैं। अवसर सामने आन पड़ता है तो वह हमारे व्यवहार से प्रकट हो जाता है कि हमने उन बातों को शायद अनसुनी कर दिया या समझा ही नहीं। हमलोगों की दशा ठीक वैसी ही हो जाती है कि “लाख तोते को पढाया फिर भी हैवां ही रहा”। वह तो पशु-पक्षी हैं और वही रहेंगे, चाहे कितना भी उनको पढ़ा दें। वह भी कुछ हद तक समझदार होते हैं, लेकिन हम तो मनुष्य हैं। सुख और दुःख जिसको हम समझते हैं- या तो वह सामग्री से हमलोग सुखी होते हैं, या उस मोह से, माया से, ममता से, लगाव से ग्रसित होकर हमारी बुद्धि हरी जाती है। संसार में दुःख-सुख दोनों है, परन्तु इसमें दुःख-ही-दुःख अधिक है। क्योंकि जो भी हमारे सामने है चाहे वह सामग्री हो, चाहे घर, जमीन-जायदाद, रुपया-पैसा-जेवर हो, चाहे हमारे परिजन हों, मित्र-साथी हों, बड़े हों, छोटे हों, किसी का समय निश्चित नहीं होता है। कब, कौन, किस समय साथ छोड़ देता है? यह तो क्षणभंगुर संसार है ही। हम दुखित होते हैं, हम रोते हैं तो हमारी आत्मा को भी वह तकलीफ होती है। हम अपने ही अपने को नहीं समझ पाते हैं, अपने ही अपने को नहीं देख पाते हैं, अपने अपने में नहीं रह पाते हैं। हम दूसरों को ही देखते रहते हैं, दूसरों को ही समझाते रहते हैं, हम खुद न समझे हों। तो हमारा जीवन कुछ ऐसा ही कृत्रिम रूप से हमलोग बना लेते हैं। बहुत-से आकर्षण हैं, बहुत-सी ऐसी चीजें हैं जिससे हमलोग विचलित हो जाते हैं। जो अच्छे कर्म किये होते हैं, जिन्होंने अच्छा जीवन जिया होता है उसके लिए कोई कुछ करे न करे, कोई फर्क नहीं पड़ता है। उसके लिए हमारे संत-महात्मा, महापुरुष, ईश्वर ही सब कर देते हैं। तो हमें अपने-आप पर ध्यान देना होगा, अपने-आप पर दया करनी होगी। वह महापुरुष हैं, वह कहीं नहीं गए हैं, वही सब जगह व्याप्त हैं। जहाँ तक अपने-आपको बचाने का है तो आज के इस कलिकाल में बहुत बड़ा महत्व हमारी माताओं के ऊपर हो गया है। क्योंकि सभी उस अर्थ के पीछे भाग रहे हैं। आज खान-पान की सभी चीजों में मिलावटखोरी चरम पर है। एक आदमी की हत्या कर देने पर व्यक्ति को फाँसी तक हो जाती है मगर जो हजारों-लाखों को तिल-तिल कर मारते हैं उनको रोकने में हमारा शासन-प्रशासन असफल साबित हो रहा है।
उल्लेखनीय है कि कोविड के इस काल में गत् वर्ष से संस्था के समस्त कार्यक्रम बड़ी ही सादगी से मनाये जा रहे हैं। इसी क्रम में यह कार्यक्रम भी संस्था के पदाधिकारियों और आश्रम में निवास करने वाले श्रद्धालुओं द्वारा ही मनाया गया। संस्था के सदस्यों/शिष्यों को संस्था द्वारा पहले ही सूचित कर दिया गया था कि वे लोग अपने-अपने स्थान से इस पर्व पर अपनी श्रद्धा-सुमन अर्पित करें।



संवाददाता
हिमांशु सिंह
राज्य डिप्टी ब्यूरो चीफ

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