भ्र्ष्टाचार अधिनियम कब लागू हुआ

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लोकसेवकों का भ्रष्टाचार और लोकपाल-लोकायुक्त
संदर्भ
कुछ समय पूर्व अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (Transparency International) ने करप्शन परसेप्शन इंडेक्स-2018 (Corruption Perception Index -2018) जारी किया था। इसमें भारत 180 देशों की सूची में 78वें स्थान पर रहा।

भारत में लोकसेवकों का भ्रष्टाचार एक ऐसा खतरा बन गया है, जिसे रोकने के लिये कुछ नया करने की आवश्यकता थी और लोकपाल की नियुक्ति आंशिक रूप से इस जरूरत को पूरा करती है।
लोकपाल के संभावित प्रभाव को लेकर कुछ वर्गों और तबकों में आशावादिता है, तो कुछ ऐसे हैं जो इसकी बेहद कटु आलोचना करते नहीं थक रहे।
इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 का स्वरूप बेहद जटिल है, लेकिन उच्च स्थानों और पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही बढ़ाना और दुनिया को यह दिखाना बेहद आवश्यक था कि भारत अपने सार्वजनिक प्रशासन को स्वच्छ और निष्पक्ष बनाने में किसी भी अन्य देश से पीछे नहीं है।
लेकिन लोकपाल की नियुक्ति में इतना अधिक विलंब हुआ कि इसे लेकर आम जनता और राजनीतिक दलों में कोई उत्सुकता नज़र नहीं आई। फिर भी, उम्मीद है कि आने वाले समय में राजनेताओं और कानूनी बिरादरी में लोकपाल कानून का असर देखने को मिलेगा।
राष्ट्रीय स्तर भ्रष्टाचार के विरुद्ध काम करने वाले प्रमुख संस्थान
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में राष्ट्रीय स्तर पर तीन प्रमुख संस्थान हैं: लोकपाल, केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC), और केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI)। लोकपाल के गठन से पूर्व ही इसकी स्वतंत्रता पर सवाल उठाए जाते रहे हैं और यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह अन्य जाँच एजेंसियों के साथ कैसे काम करेगा ताकि सार्वजनिक जीवन को भ्रष्टाचार मुक्त करने का उद्देश्य संतोषजनक तरीके से हासिल किया जा सके। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जिस उद्देश्य के लिये लोकपाल बनाया गया है, उसे बरकरार रखने में CVC और CBI अपनी पूरक भूमिका का निर्वहन किस प्रकार करेंगे।

क्षेत्राधिकार का मुद्दा
लोकपाल का अधिकार क्षेत्र ग्रुप A और B के लोकसेवकों पर है और यह इन दोनों समूहों पर CBI को उसके अधिकार क्षेत्र से वंचित नहीं करता।
लोकपाल अधिनियम लोकसेवकों के खिलाफ शिकायत की जाँच CBI से कराने की अनुमति देता है। हालाँकि लोकपाल की अपनी अलग जाँच इकाई है, फिर भी यह प्रारंभिक जाँच के लिये किसी शिकायत को CBI के पास अग्रेषित कर सकता है और उसके बाद भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत नियमित मामला दर्ज करने के लिये कह सकता है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि जब ऐसी शिकायत की जाँच CBI पहले से ही कर रही है तो क्या होगा।

लोकपाल के अलावा सरकार के पास यह अधिकार है कि वह किसी मामले में प्रारंभिक जाँच का आदेश दे सकती है और CBI को नियमित मामला दर्ज कर कानूनी कार्रवाई करने की अनुमति दे सकती है।
यदि कोई लोकसेवक रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा जाता है तो ऐसे मामले में CBI सरकार की अनुमति के बिना मामला दर्ज कर सकती है।
यदि किसी ने व्यक्तिगत रूप से सरकार और लोकपाल के पास शिकायत दर्ज कराई है तो इसे लेकर लोकपाल के अधिकार के बारे में कोई स्पष्टता नहीं है कि वह मामले को बंद रखने के लिये CBI को निर्देश दे और मामले को लोकपाल की अपनी जाँच इकाई द्वारा अपने हाथों में लेने की प्रतीक्षा करे।
भारत में यह देखने को मिलता है कि शिकायतकर्त्ता अपनी शिकायत को कई जाँच एजेंसियों को भेज देते हैं। लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 में लोकपाल के लिये विशेष रूप से अभियोजन इकाई का गठन किया गया है। ऐसे में इस तरह के मामलों में लोकपाल की जाँच इकाई और CBI के अभियोजन निदेशक के बीच समन्वय का मुद्दा उठने की संभावना बनी रहेगी।
कई मुद्दे ऐसे हो सकते हैं जिनमें सरकार और लोकपाल के बीच टकराव की संभावना हो सकती है, विशेषकर ऐसे मामले जिनमें लोकपाल की तुलना में CBI के पास जाँच की अधिक शक्तियाँ हैं।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988
भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 करीब तीन दशक पुराना है।
इसे संशोधन के लिये 2013 में संसद में पेश किया गया था, लेकिन सहमति न बन पाने पर इसे स्थायी समिति और प्रवर समिति के पास भेजा गया। साथ ही समीक्षा के लिये इसे विधि आयोग के पास भी भेजा गया।
समिति ने 2016 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसके बाद 2017 में इसे दोबारा संसद में लाया गया। पारित होने के बाद इसे भ्रष्टाचार निरोधक संशोधन विधेयक-2018 कहा गया।
संशोधित विधेयक में रिश्वत देने वाले को भी इसके दायरे लाया गया है।
इसमें भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने और ईमानदार कर्मचारियों को संरक्षण देने का प्रावधान है।
लोकसेवकों पर भ्रष्टाचार का मामला चलाने से पहले केंद्र के मामले में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्तों से अनुमति लेनी होगी।
रिश्वत देने वाले को अपना पक्ष रखने के लिये 7 दिन का समय दिया जाएगा, जिसे 15 दिन तक बढ़ाया जा सकता है।
जाँच के दौरान यह भी देखा जाएगा कि रिश्वत किन परिस्थितियों में दी गई है।
भ्रष्टाचार और लोकपाल
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश पी.सी. घोष के देश के पहले लोकपाल के रूप में शपथ लेते ही देश में एक नई संस्था ने आकार ले लिया। हालांकि लोकपाल सदस्यों की भी घोषणा हो चुकी है, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह संस्था विधिवत ढंग से अपना काम कब से और कैसे करेगी। यह अस्पष्टता जितनी जल्दी दूर हो उतना ही अच्छा, क्योंकि पहले ही अनावश्यक विलंब हो चुका है।

करीब चार दशक के इंतज़ार के बाद 2013 में लोकपाल संबंधी विधेयक को संसद की मंज़ूरी मिल गई थी, लेकिन किन्हीं कारणों से लोकपाल और उसके सदस्यों के नाम तय करने में छह साल लग गए। अब ज़रूरी यह है कि केंद्रीय स्तर के नेताओं और नौकरशाहों के भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने वाली लोकपाल नामक नई संस्था उन उम्मीदों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़े जो उससे लगाई गई हैं।

यह सही है कि भ्रष्टाचार से लड़ने का काम केंद्रीय जाँच ब्यूरो और सुप्रीम कोर्ट के ज़रिये अभी भी हो रहा है, लेकिन CBI की अपनी सीमाएँ हैं और फिर वह सरकार के नियंत्रण में काम करने वाली एजेंसी है। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट की भी अपनी सीमाएँ हैं। इन हालात में सरकार से इतर एक स्वतंत्र एवं स्वायत्त संस्था की ज़रूरत महसूस की जा रही थी। इससे बेहतर और कुछ नहीं कि लोकपाल संस्था अपने कार्य-व्यवहार से अपनी साख बनाने का काम करे। यह बहुत कुछ उसके कामकाज के तौर-तरीकों पर निर्भर करेगा।

उचित यह होगा कि नई सरकार का गठन होने से पहले ही लोकपाल संस्था जाँच और अभियोजन संबंधी अपने तंत्र का गठन कर ले। केंद्रीय सेवाओं के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के साथ-साथ केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को इसका आभास होना आवश्यक है कि भ्रष्टाचार की जाँच करने वाली एक नई और सक्षम संस्था अस्तित्व में आ चुकी है। लोकपाल संस्था के सक्रिय होने के बाद भ्रष्टाचार के मामलों में कमी आने के साथ ही भ्रष्ट तत्त्वों के मन में भय व्याप्त होना आवश्यक है।

कुछ सुझाव
भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसियों के कार्यों के मद्देनज़र एक-दूसरे के अधिकार क्षेत्र में दखल की आशंका लगातार बनी रहती है। ऐसे में 2018 में एक संसदीय समिति द्वारा दी गई सिफारिशों का महत्त्व बढ़ जाता है।
इस समिति ने भ्रष्टाचार के मामलों से निपटने के लिये CVC और CBI की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा का एकीकरण कर इसका नियंत्रण सीधे लोकपाल के तहत देने की सिफारिश की थी।
समिति का विचार था कि CVC और CBI पूरी तरह से लोकपाल के साथ एकीकृत हों और भ्रष्टाचार निरोधी संस्था शीर्ष स्तर पर लोकपाल के साथ हो तथा CVC और CBI उनके आदेश और नियंत्रण में काम करे।
इसके अलावा, मौजूदा नियमों की समीक्षा करने की आवश्यकता है। डिजिटल निगरानी सॉफ्टवेयर के उपयोग के प्रावधानों में एकरूपता होनी चाहिये, ताकि किसी लोकसेवक की संपत्तियों और देनदारियों में किसी भी तरह की असमान और असाधारण बढ़ोतरी का पता लगाया जा सके।
आगे की राह
लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 को उपर्युक्त प्रावधानों को शामिल करने के लिये संशोधित किया जाना चाहिये।
सभी जाँच एजेंसियों को सशक्त किया जाना चाहिये तथा साथ ही जाँच और संतुलन को बनाए रखना चाहिये।
भ्रष्टाचार विरोधी कानून बनाने उन्हें व्यवहार में लाने और उनके प्रवर्तन के बीच के अंतराल को कम किया जाना चाहिये।
चूँकि अभी पहला ही लोकपाल नियुक्त हुआ है, इसलिये प्रारंभ में समन्वय कायम करने में कठिनाई हो सकती है। सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि भ्रष्टाचार पर प्रहार करने के मूल उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित करते हुए लोकपाल और सरकार आपस में किस प्रकार सहयोग करते हैं। हालाँकि ये सभी मुद्दे लोकपाल की उपयोगिता को कम नहीं करते और यह आखिरकार लोकपाल की धारणा पर निर्भर करेगा कि उसकी भूमिका क्या है।

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल का करप्शन परसेप्शन इंडेक्स
भ्रष्टाचार के खिलाफ पहल करने के लिये ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की स्थापना 1993 में हुई थी। वर्तमान में यह 100 से अधिक देशों में मौजूद है और इसका सचिवालय जर्मनी की राजधानी बर्लिन में है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने 1995 में पहली बार करप्शन परसेप्शन इंडेक्स जारी किया था। तब से यह सार्वजनिक क्षेत्र के भ्रष्टाचार का प्रमुख वैश्विक संकेतक बन गया है। इस सूचकांक में विश्व के अधिकांश देशों और क्षेत्रों की रैंकिंग के आधार पर भ्रष्टाचार के स्तर की पहचान की जाती है। वर्तमान में इसके तहत 180 देशों की रैंकिंग की जाती है और इसके लिये 0 से 100 के पैमाने का उपयोग किया जाता है। जहाँ शून्य अत्यधिक भ्रष्ट स्थिति को दर्शाता है वहीं 100 ऐसे देश को दर्शाता है जहाँ भ्रष्टाचार नहीं है। इस सूचकांक के तहत 13 अलग-अलग डेटा स्रोतों का उपयोग करके देशों को रैंकिंग प्रदान की जाती है।

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